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अँधेरी हवेली का आखिरी मेहमान | Kissa Aapka

  अँधेरी हवेली का आखिरी मेहमान एक ऐसी डरावनी कहानी, जिसे पढ़ने के बाद शायद आप रात में अकेले सोना पसंद न करें... बरसात की वह रात आज भी गाँव के बूढ़े लोगों की यादों में ज़िंदा है। कहते हैं, उस रात आसमान सिर्फ बारिश नहीं बरसा रहा था... बल्कि किसी अधूरी आत्मा का दर्द भी धरती पर उतर रहा था। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भैरवपुर के बाहर, घने जंगलों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। लोग उसे "काली हवेली" कहते थे। दिन में भी वहाँ कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को डराने के लिए माताएँ कहती थीं— "अगर शरारत की... तो काली हवेली वाली औरत तुम्हें ले जाएगी।" लेकिन किसी ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि उस हवेली में आखिर था क्या... जब लालच डर से बड़ा हो गया शहर का रहने वाला आरव एक यूट्यूबर था। वह ऐसी जगहों पर जाकर वीडियो बनाता था जहाँ लोग जाने से डरते थे। एक दिन उसे किसी ने काली हवेली के बारे में बताया। "अगर हिम्मत है... तो वहाँ पूरी रात बिताकर दिखाओ।" आरव हँस पड़ा। "भूत-वूत कुछ नहीं होते... बस लोगों का वहम होता है।" उसने कैमरा उठाया...

Baap Bete Ki Emotional Story in Hindi | Ek Baap Ka Saccha Tyag | Kissa Aapka

 

Baap Bete Ki Emotional Story in Hindi | Ek Baap Ka Saccha Tyag



Baap Bete Ki Emotional Story in Hindi | Ek Baap Ka Saccha Tyag | Kissa Aapka


भारत के एक छोटे से गाँव में रामलाल नाम का एक आदमी रहता था। उसकी जिंदगी बहुत साधारण थी। मिट्टी का छोटा सा घर, घर के बाहर एक पुरानी साइकिल, और रोज़ की मजदूरी से चलने वाला जीवन।

रामलाल की दुनिया बहुत छोटी थी—लेकिन उस छोटी सी दुनिया में उसका सबसे बड़ा खजाना था उसका 8 साल का बेटा चिराग

रामलाल की पत्नी का देहांत चिराग के जन्म के कुछ साल बाद ही हो गया था। तब से रामलाल ने अकेले ही माँ और बाप दोनों की जिम्मेदारी निभाई।

गाँव वाले अक्सर कहते थे,
“रामलाल, दूसरी शादी कर ले… जिंदगी आसान हो जाएगी।”

लेकिन रामलाल हमेशा मुस्कुराकर एक ही जवाब देता:

“मेरा बेटा ही मेरी पूरी दुनिया है।”

हर सुबह रामलाल 5 बजे उठता। पहले बेटे के लिए खाना बनाता, फिर उसके कपड़े तैयार करता, उसके बाल बनाता, और उसे स्कूल छोड़ने जाता।

एक दिन स्कूल जाते हुए चिराग ने पूछा:

“बाबा, आप इतने थकते नहीं?”

रामलाल मुस्कुराया।

“जब बेटा साथ हो तो थकान कहाँ लगती है?”

चिराग हँस पड़ा।

उसकी हँसी रामलाल के लिए दुनिया की सबसे कीमती आवाज़ थी।

लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं रहती।

एक दिन स्कूल में टीचर ने बच्चों से पूछा:

“बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”

किसी ने डॉक्टर कहा, किसी ने पुलिस।

चिराग खड़ा हुआ और बोला:

“मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा… और अपने बाबा को कभी काम नहीं करने दूँगा।”

पूरी क्लास तालियाँ बजाने लगी।

शाम को चिराग दौड़ते हुए घर आया।

“बाबा! मैं बड़ा होकर बहुत पैसे कमाऊँगा।”

रामलाल ने पूछा,
“क्यों?”

चिराग बोला,
“ताकि आपके हाथों के ये छाले खत्म हो जाएँ।”

रामलाल कुछ सेकंड चुप रहा।

उसने अपने खुरदरे हाथ देखे।

फिर बेटे के सिर पर हाथ रखा।

उसकी आँखें भर आईं, लेकिन उसने आँसू छिपा लिए।

रात को जब चिराग सो गया, रामलाल उसे देखता रहा।

धीरे से बोला:

“भगवान… मेरे बेटे के सपने पूरे कर देना। मेरी उम्र भी इसे दे देना।”

समय बीतता गया।

चिराग पढ़ाई में बहुत तेज निकला।

हर साल क्लास में पहला आता।

लेकिन जैसे-जैसे पढ़ाई आगे बढ़ी, खर्च भी बढ़ता गया।

स्कूल फीस… किताबें… यूनिफॉर्म…

रामलाल की मजदूरी कम पड़ने लगी।

एक रात उसने घर का पुराना बक्सा खोला।

उसमें उसकी पत्नी की आखिरी निशानी थी—एक छोटी सी सोने की चेन।

रामलाल ने उसे हाथ में लिया।

आँखें नम हो गईं।

“माफ करना… लेकिन बेटे के सपने इससे बड़े हैं।”

अगली सुबह उसने चेन बेच दी।

उस पैसों से चिराग की फीस भर दी।

चिराग को कुछ पता नहीं था।

वह सिर्फ इतना जानता था कि उसका बाबा हर मुश्किल आसान कर देता है।

उसे नहीं पता था कि उसका बाबा हर दिन थोड़ा-थोड़ा खुद को तोड़ रहा था।

एक शाम, काम से लौटते वक्त रामलाल सड़क पर बेहोश होकर गिर पड़ा…

रामलाल सड़क पर बेहोश होकर गिर पड़ा।

आस-पास के लोगों ने उसे तुरंत अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टर ने जांच के बाद कहा:

“इनका शरीर बहुत कमजोर हो चुका है। लगातार मेहनत, कम खाना और तनाव की वजह से हालत बिगड़ गई है।”

जब चिराग को खबर मिली, वह भागते हुए अस्पताल पहुँचा।

“बाबा… बाबा आँखें खोलो…”

रामलाल ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

अपने बेटे को रोता देखकर उसने कमजोर आवाज़ में कहा:

“अरे पगले… मैं कहीं नहीं जा रहा।”

लेकिन इस बार चिराग समझ गया था कि बात साधारण नहीं है।

उसने पहली बार अपने पिता को इतना कमजोर देखा था।

डॉक्टर ने बाहर बुलाकर कहा:

“तुम्हारे पिता खुद का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते। इन्हें आराम चाहिए।”

चिराग ने पूछा:

“लेकिन डॉक्टर साहब… ये ऐसा क्यों कर रहे थे?”

डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा:

“कई लोग अपने बच्चों के लिए खुद को भूल जाते हैं।”

यह सुनते ही चिराग की आँखें भर आईं।

उसे अचानक कई बातें याद आने लगीं—

  • बाबा का कई बार खाना छोड़ देना

  • पुराने फटे कपड़ों में रहना

  • अपने लिए कभी कुछ न खरीदना

  • हमेशा कहना: “मुझे कुछ नहीं चाहिए”

अब उसे सब समझ आ रहा था।

उस रात चिराग अस्पताल की कुर्सी पर बैठा रहा।

उसने अपने सोते हुए बाबा के हाथ पकड़े।

उन्हीं हाथों में गहरे छाले थे।

वह रो पड़ा।

धीरे से बोला:

“बाबा… मैं बहुत छोटा था इसलिए समझ नहीं पाया। आपने मेरे लिए कितना सहा…”

अगले दिन रामलाल घर लौट आया।

लेकिन डॉक्टर ने सख्त मना किया था:

“भारी काम बिल्कुल नहीं।”

समस्या यह थी कि घर कैसे चलेगा?

कमाने वाला सिर्फ रामलाल था।

कुछ दिन तक जैसे-तैसे गुजरा।

फिर एक सुबह चिराग ने फैसला कर लिया।

स्कूल जाने के बजाय वह शहर के एक छोटे होटल में पहुँचा।

“मुझे काम चाहिए।”

होटल मालिक ने पूछा:

“उम्र कितनी है?”

“16 साल।”

“काम क्यों करना है?”

चिराग बोला:

“अपने बाबा के लिए।”

उसकी आवाज़ में ऐसी सच्चाई थी कि होटल मालिक कुछ पल चुप रहा।

उसने कहा:

“ठीक है। शाम को आ जाना।”

उस दिन से चिराग सुबह स्कूल जाता और शाम को होटल में काम करता।

टेबल साफ करना, पानी देना, बर्तन उठाना…

रात को घर लौटते-लौटते 11 बज जाते।

लेकिन उसने बाबा को कुछ नहीं बताया।

वह कहता:

“स्कूल में extra classes चल रही हैं।”

रामलाल खुश हो जाता।

“अच्छा है बेटा, पढ़ाई पर ध्यान दे।”

दिन गुजरते गए।

एक दिन होटल में काम करते वक्त चिराग ने देखा—उसकी क्लास का एक लड़का वहाँ खाना खाने आया है।

उस लड़के ने उसे पहचान लिया।

“अरे… तू यहाँ काम करता है?”

आस-पास बैठे लोग देखने लगे।

चिराग का सिर झुक गया।

उस लड़के ने हँसते हुए कहा:

“इंजीनियर बनेगा ना? पहले वेटर बन गया!”

सभी हँस पड़े।

चिराग का दिल टूट गया।

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

लेकिन उसने खुद को संभाला।

उसने मन ही मन कहा:

“मैं यह अपने बाबा के लिए कर रहा हूँ। मुझे किसी की हँसी से फर्क नहीं पड़ना चाहिए।”

उस रात घर आकर वह बहुत चुप था।

रामलाल ने पूछा:

“क्या हुआ बेटा?”

चिराग बोला:

“कुछ नहीं बाबा… बस थक गया हूँ।”

रामलाल ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

उसे महसूस हुआ कि बेटा कुछ छुपा रहा है।

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

कुछ दिनों बाद सच्चाई सामने आ गई।

एक शाम रामलाल दवाई लेने शहर गया था।

वहीं उसने अपने बेटे को होटल में काम करते देख लिया।

चिराग हाथ में ट्रे लिए भाग-दौड़ कर रहा था।

रामलाल कुछ सेकंड के लिए पत्थर बन गया।

उसकी आँखें फैल गईं।

दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“मेरा बेटा… काम कर रहा है?”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उसने कभी नहीं चाहा था कि उसका बेटा इतनी छोटी उम्र में संघर्ष करे।

रात को घर पहुँचते ही उसने चिराग से पूछा:

“सच बता… तू काम करता है?”

चिराग चुप।

“जवाब दे!”

चिराग की आँखें भर आईं।

“हाँ बाबा…”

रामलाल की आवाज़ काँप गई।

“क्यों?”

अब चिराग खुद को रोक नहीं पाया।

वह जोर से रो पड़ा।

“क्योंकि मैं आपको मरते हुए नहीं देख सकता!”

घर में सन्नाटा छा गया।

चिराग रोते हुए बोला:

“मैं रोज़ आपको टूटते देखता था… भूखे सोते देखता था… अपने सपनों को बेचते देखता था…”

“अब मैं बड़ा हो गया हूँ बाबा… मुझे भी आपका दर्द उठाने दो…”

रामलाल के होंठ काँपने लगे।

उसने बेटे को सीने से लगा लिया।

दोनों बाप-बेटे फूट-फूट कर रोने लगे।

रामलाल सिर्फ एक ही बात दोहराता रहा:

“माफ कर दे बेटा… माफ कर दे…”

उस रात के बाद बाप-बेटे के रिश्ते में कुछ बदल गया।

पहले जहाँ रामलाल अपने दर्द को छिपाता था, अब चिराग उसकी आँखों में छुपी हर बात पढ़ने लगा था।

अगले दिन रामलाल ने चिराग से कहा:

“बेटा, आज से तू होटल में काम नहीं करेगा।”

चिराग ने तुरंत जवाब दिया:

“तो घर कैसे चलेगा बाबा?”

रामलाल कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला:

“घर मैं संभाल लूँगा… लेकिन तेरी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।”

चिराग की आवाज़ भारी हो गई।

“और अगर आपकी तबीयत फिर खराब हो गई तो?”

रामलाल मुस्कुराया, लेकिन इस बार उस मुस्कान में दर्द साफ दिख रहा था।

“पिता तब तक नहीं टूटता बेटा… जब तक उसके बच्चे खड़े होना नहीं सीख जाते।”

यह शब्द चिराग के दिल में उतर गए।

उस दिन उसने एक फैसला लिया।

वह पढ़ाई और मेहनत—दोनों दुगुनी ताकत से करेगा।

अब उसका एक ही लक्ष्य था:

इंजीनियर बनना… और अपने बाबा को आराम देना।

समय तेजी से बीता।

12वीं बोर्ड परीक्षा का रिज़ल्ट आया।

पूरा गाँव हैरान रह गया।

चिराग ने जिले में टॉप किया था।

स्कूल के प्रिंसिपल खुद रामलाल के घर आए।

“रामलाल, तुम्हारा बेटा बहुत बड़ा नाम करेगा।”

रामलाल की आँखें चमक उठीं।

उसे लगा जैसे वर्षों की मेहनत रंग ला रही है।

लेकिन खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी।

कुछ ही दिनों बाद चिराग के पास शहर के बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज से admission letter आया।

फीस देखकर दोनों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

पहले साल की फीस: 1,85,000 रुपये

घर में सन्नाटा छा गया।

रामलाल ने धीरे से कागज़ नीचे रखा।

उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

इतने पैसे…?

उसने जिंदगी में कभी एक साथ इतने पैसे नहीं देखे थे।

रात को चिराग ने चुपचाप admission letter मोड़कर रख दिया।

“बाबा, मैं नहीं जाऊँगा।”

रामलाल ने सिर उठाया।

“क्या?”

“मैं कॉलेज नहीं जाऊँगा।”

“पागल हो गया है?”

चिराग की आँखें भर आईं।

“मैं आपके ऊपर और बोझ नहीं बन सकता।”

यह सुनते ही रामलाल गुस्से में खड़ा हो गया।

“बोझ?”

उसकी आवाज़ पहली बार इतनी ऊँची हुई।

“तू मेरे लिए बोझ है?”

चिराग चुप हो गया।

रामलाल की आँखों से आँसू बह निकले।

“मेरी पूरी जिंदगी तेरे सपनों के लिए लगी है… और आज तू हार मान रहा है?”

“लेकिन पैसे…”

रामलाल ने उसका हाथ कसकर पकड़ा।

“पैसे मैं लाऊँगा।”

“कैसे?”

रामलाल ने जवाब नहीं दिया।

अगले दिन वह सुबह-सुबह घर से निकल गया।

शाम को लौटा… हाथ खाली थे, लेकिन चेहरा बदला हुआ था।

उस रात उसने खाना भी ठीक से नहीं खाया।

अगले 3 दिन तक वह रोज़ कहीं जाता रहा।

चिराग समझ नहीं पा रहा था।

चौथे दिन रामलाल घर आया और मेज पर पैसे रख दिए।

पूरा बंडल।

चिराग की आँखें फैल गईं।

“बाबा… ये पैसे कहाँ से आए?”

रामलाल ने नजरें चुरा लीं।

“जुगाड़ हो गया।”

“कैसा जुगाड़?”

“तुझे बस admission लेना है।”

लेकिन इस बार चिराग नहीं रुका।

उसने गाँव में पूछताछ शुरू की।

कुछ घंटों बाद सच सामने आया।

सच सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

रामलाल ने…

घर बेच दिया था।

उनका छोटा सा मिट्टी का घर…

वही घर जिसमें चिराग बड़ा हुआ था…

वही घर जिसमें उसकी माँ की यादें थीं…

सब बिक चुका था।

चिराग दौड़ता हुआ बाबा के पास पहुँचा।

उसकी साँसें तेज थीं।

“आपने घर बेच दिया?”

रामलाल चुप।

“जवाब दीजिए!”

कुछ सेकंड बाद रामलाल ने धीरे से कहा:

“हाँ।”

चिराग फूट पड़ा।

“आपने ऐसा कैसे कर दिया बाबा?”

रामलाल ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में दर्द नहीं… गर्व था।

“घर ईंटों से बनता है बेटा।”

फिर उसने चिराग के सीने पर हाथ रखा।

“मेरा असली घर यहाँ है।”

चिराग जोर-जोर से रोने लगा।

“मैं नहीं जाऊँगा कॉलेज!”

रामलाल ने पहली बार बेहद सख्त आवाज़ में कहा:

“जाएगा।”

“नहीं!”

“जाएगा!”

घर में भारी सन्नाटा छा गया।

रामलाल की आँखों में आँसू थे।

“अगर आज तू पीछे हट गया… तो मेरा सब कुछ बेचना बेकार हो जाएगा।”

चिराग घुटनों पर बैठ गया।

“बाबा…”

रामलाल भी बैठ गया।

उसने बेटे का चेहरा दोनों हाथों में लिया।

“सुन…”

“मैं गरीब हो सकता हूँ…”

“कमज़ोर हो सकता हूँ…”

“लेकिन मेरे सपने गरीब नहीं हैं।”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मेरा सपना तू है, चिराग।”

चिराग अब खुद को संभाल नहीं पा रहा था।

वह पिता के सीने से लगकर फूट-फूटकर रो पड़ा।

रामलाल ने उसे कसकर पकड़ लिया।

उस रात दोनों खुले आसमान के नीचे सोए।

क्योंकि अब घर उनका नहीं रहा था।

लेकिन उस रात चिराग ने मन में कसम खाई—

एक दिन वह अपने बाबा को ऐसा घर देगा, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

लेकिन किस्मत अभी उनका सबसे कठिन इम्तिहान लेना बाकी थी…

अगली सुबह रामलाल को अचानक सीने में तेज दर्द उठा…

अगली सुबह रामलाल को अचानक सीने में तेज दर्द उठा।

वह दर्द इतना भयानक था कि वह जमीन पर गिर पड़ा।

“बा…बा!”

चिराग चीखता हुआ उसके पास दौड़ा।

रामलाल की साँसें तेज चल रही थीं। माथे पर पसीना था, और चेहरा पीला पड़ चुका था।

चिराग घबराकर लोगों को बुलाने लगा।

गाँव वालों ने मिलकर रामलाल को तुरंत अस्पताल पहुँचाया।

डॉक्टर ने जांच की।

कुछ मिनट बाद डॉक्टर बाहर आए।

उनका चेहरा गंभीर था।

चिराग का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“डॉक्टर साहब… बाबा ठीक तो हो जाएंगे ना?”

डॉक्टर ने धीरे से कहा:

“हार्ट अटैक था।”

चिराग के पैरों से जैसे ताकत निकल गई।

“लेकिन…”

डॉक्टर ने गहरी साँस ली।

“इनका दिल बहुत कमजोर हो चुका है। इन्हें लंबे समय से आराम चाहिए था।”

चिराग वहीं कुर्सी पर बैठ गया।

उसकी आँखों के सामने पिछले कई साल घूमने लगे—

बाबा का भूखे सोना…

बाबा का चुपके से रोना…

माँ की चेन बेचना…

घर बेचना…

सब कुछ…

सिर्फ उसके लिए।

उसने सिर पकड़ लिया।

“हे भगवान… मेरे बाबा को बचा लो…”

कुछ देर बाद नर्स बाहर आई।

“मरीज आपसे मिलना चाहते हैं।”

चिराग दौड़ता हुआ अंदर गया।

रामलाल ऑक्सीजन मास्क लगाए लेटा था।

लेकिन जैसे ही उसने बेटे को देखा, उसकी आँखों में वही पुराना प्यार चमक उठा।

उसने हाथ उठाने की कोशिश की।

चिराग ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

“बाबा… कुछ मत बोलिए।”

रामलाल ने कमजोर आवाज़ में कहा:

“Admission…”

चिराग रो पड़ा।

“मुझे कहीं नहीं जाना… मुझे बस आप चाहिए।”

रामलाल ने सिर हिलाया।

“नहीं बेटा…”

“बाबा प्लीज़…”

रामलाल की आवाज़ टूट रही थी।

“एक वादा कर…”

चिराग रोते हुए बोला:

“कुछ भी।”

“इंजीनियर बनेगा।”

“बाबा…”

“वादा कर।”

चिराग की रुलाई नहीं रुक रही थी।

आखिर उसने काँपती आवाज़ में कहा:

“वादा करता हूँ…”

रामलाल की आँखों से आँसू बह निकले।

वह हल्का सा मुस्कुराया।

“मुझे पता था… मेरा बेटा कभी नहीं हारेगा…”

उसने धीरे से चिराग के सिर पर हाथ रखा।

ठीक वैसे ही जैसे बचपन में रखा करता था।

फिर उसने आखिरी बार कहा—

“मुझे तुम पर गर्व है…”

बीप————

मशीन की आवाज़ अचानक सीधी हो गई।

चिराग जम गया।

“बाबा…?”

कोई जवाब नहीं।

“बाबा… उठो ना…”

उसने जोर से पिता का हाथ पकड़ा।

“देखो… मैं इंजीनियर बनूँगा…”

“मैं आपका सपना पूरा करूँगा…”

“बाबा… प्लीज़…”

लेकिन इस बार रामलाल सच में जा चुका था।

चिराग की चीख पूरे अस्पताल में गूँज उठी।

“बाबााआआ…!”

उस दिन चिराग ने सिर्फ अपने पिता को नहीं खोया…

उसने अपनी पूरी दुनिया खो दी।

लेकिन उसने वादा नहीं तोड़ा।

दिन बीते।

महीने बीते।

साल बीते।

चिराग ने पढ़ाई में खुद को झोंक दिया।

वह दिन-रात पढ़ता।

जब भी थकता, बाबा की आवाज़ सुनाई देती:

“मेरा सपना तू है।”

यही शब्द उसकी ताकत बन गए।

चार साल बाद…

इंजीनियरिंग कॉलेज का Convocation Day।

स्टेज पर नाम पुकारा गया—

“Gold Medalist — Chirag Ramlal!”

पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

चिराग स्टेज पर गया।

उसने गोल्ड मेडल लिया।

लेकिन उसकी आँखें भीग चुकी थीं।

सबके माता-पिता audience में बैठे थे।

लेकिन उसकी सीट खाली थी।

वह खाली कुर्सी उसे चुभ रही थी।

स्टेज से उतरते ही उसने आसमान की तरफ देखा।

धीरे से बोला:

“बाबा… हमने कर दिखाया।”

कुछ साल बाद…

चिराग एक बड़ी कंपनी में Senior Engineer बन गया।

पहली बड़ी salary मिलने के बाद उसने सबसे पहला काम किया।

वह अपने गाँव लौटा।

उसी जगह गया जहाँ कभी उनका मिट्टी का घर था।

वहाँ अब खाली जमीन थी।

चिराग ने वही जमीन खरीदी।

और वहाँ एक सुंदर पक्का घर बनवाया।

बड़ा घर।

साफ दीवारें।

सुंदर दरवाज़ा।

बिल्कुल वैसा… जैसा उसने उस रात कसम खाई थी।

घर बनकर तैयार हुआ।

गृह प्रवेश के दिन पूरे गाँव को बुलाया गया।

सब आए।

लेकिन चिराग सबसे पहले एक फोटो लेकर अंदर गया।

वह फोटो थी…

उसके बाबा की।

उसने फोटो दीवार पर लगाई।

फोटो के नीचे लिखा था:

“इस घर का असली मालिक — रामलाल”

चिराग अब खुद को रोक नहीं पाया।

वह फोटो के सामने बैठ गया।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“बाबा…”

“घर बन गया…”

“अब आपको काम नहीं करना पड़ेगा…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“लेकिन…”

“काश आप आज यहाँ होते…”

हवा का हल्का झोंका आया।

दीवार पर लगी फोटो थोड़ी हिली।

चिराग मुस्कुराया।

उसे लगा जैसे बाबा कह रहे हों—

“मैं यहीं हूँ बेटा।”

उसने फोटो को छुआ।

और वर्षों बाद पहली बार…

उसके आँसू दर्द के नहीं…

सुकून के थे।

कहानी से सीख

एक पिता अक्सर अपनी जरूरतों को मारकर अपने बच्चों के सपने पूरे करता है।

वह शायद अपने दर्द के बारे में कभी नहीं बोलता…

लेकिन उसके हर त्याग में प्यार छुपा होता है।

दुनिया में माँ-बाप का कर्ज कभी पूरी तरह नहीं चुकाया जा सकता।

अगर आपके माता-पिता आपके साथ हैं…

तो आज ही उन्हें बताइए—

आप उनसे कितना प्यार करते हैं।



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