माँ ने आखिरी बार जो कहा…
रात के लगभग 11 बज रहे थे।
आरव ऑफिस से थका हुआ घर लौटा।
“आ गए बेटा? खाना गरम कर दूँ?” माँ ने मुस्कुराकर पूछा।
आरव ने बैग सोफे पर फेंका और चिढ़कर बोला—
माँ कुछ सेकंड चुप रही… फिर हल्का सा मुस्कुरा दी।
“ठीक है बेटा।”
बस दो शब्द।
अगली सुबह आरव जल्दी ऑफिस निकल गया।
“माँ, मैं जा रहा हूँ!”
अंदर से धीमी आवाज़ आई—
“ठीक है बेटा… अपना ध्यान रखना।”
आरव चला गया।
उसे क्या पता था…
वो आखिरी बार था जब उसने अपनी माँ की आवाज़ सुनी।
दोपहर में फोन आया।
पड़ोसी अंकल का कॉल था।
“आरव… तुरंत घर आओ।”
दिल जोर से धड़कने लगा।
जब घर पहुँचा… बाहर भीड़ लगी थी।
उसके कदम रुक गए।
उसकी माँ… सफेद चादर में शांत लेटी थीं।
दुनिया जैसे थम गई।
“नहीं… ये नहीं हो सकता
अंतिम संस्कार के बाद घर बिल्कुल खाली लगने लगा।
न अब कोई पूछता—
कुछ दिनों बाद आरव माँ की अलमारी साफ कर रहा था।
उसे एक पुरानी डायरी मिली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर ये डायरी आरव पढ़ रहा है, तो शायद मैं उसके पास नहीं हूँ।”
आरव के हाथ काँपने लगे।
उसने आगे पढ़ा—
“मेरा बेटा बड़ा हो गया है।
आँसू डायरी पर गिरने लगे।
फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“आरव, अगर कभी मैं ना रहूँ…
नीचे एक लाइन और थी—
“और हाँ… खाना समय पर खा लिया करना।”
अब आरव टूट चुका था।
वो जोर-जोर से रोने लगा—
“माँ… एक बार डाँट लो…
लेकिन अब कोई जवाब नहीं आया।
उस दिन के बाद आरव बदल गया।
वो हर रविवार अनाथ बच्चों को खाना खिलाने लगा।
क्यों?
क्योंकि उसकी माँ कहा करती थीं—
“किसी भूखे को खाना खिलाओगे, तो भगवान तुम्हारे घर खुशियाँ भेजेंगे।”
एक दिन एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला—
“भैया, आप खाना देते हो तो मेरी मम्मी याद आती है।”
आरव की आँखें भर आईं।
उसने बच्चे को गले लगा लिया।
उस पल उसे एहसास हुआ—
माँ कभी जाती नहीं।
वो हमारी आदतों में, हमारी बातों में, हमारी दुआओं में ज़िंदा रहती हैं।
Story Moral
अगर आपकी माँ अभी आपके पास हैं…
तो आज ही जाकर उन्हें गले लगाइए।
क्योंकि…
माँ के रहते हम उनकी कीमत नहीं समझते,
और जब समझते हैं… तब बहुत देर हो चुकी होती है।
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